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vibha


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सबहिं नचावत राम गोसाईं

Posted On: 19 Apr, 2010  
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चुप्प सी लड़की

Posted On: 4 Apr, 2010  
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वृद्ध व्यस्था की आह

Posted On: 1 Apr, 2010  
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एक आगंतुक

Posted On: 29 Mar, 2010  
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धर्म और ईश्वर

Posted On: 26 Mar, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

लिख रही हूँ क्यूंकि लिखना एक ज़रूरत भी है और मजबूरी भी. ज़रूरत इसलिए क्यूंकि लिखकर मन का बोझ हल्का होता है, एक ताजगी का अनुभव होता है. और मजबूरी इसलिए क्यूंकि आप भले ही कुछ न कहना चाहें, मगर एक बार अगर कलम से अंगुलियाँ छू गईं तो फिर तो कलम चीज़ ही ऐसी है, जो चाहते न चाहते हुए भी आपके मन से बहुत कुछ उगलवा ही लेती है. आप जीभर कोशिश कर लें कि मन की बिथा मन में ही रखे, मगर मजाल है कलम आपकी चुप्पी बरक़रार रहने दे? सवाल ही नहीं उठता. और अब तो कलम भी उत्तराधुनिक युग को पार कर के, एक नए इलैक्ट्रोनिक युग में प्रवेश कर चुकी है. इसलिए थोड़ी सी और बेबाक़ हो चुकी है. आज की कलम हमारे दादा परदादा के ज़माने की वो कलम नहीं है जिसे स्याही में डुबो डुबो कर घिस घिसकर शहीद कर दिया जाता

के द्वारा:

आश्चर्य की बात है कि subhash ji जैसे लोग प्रतिरोध के परदे के पीछे से किसी भी चीज़ पर विचार करने का प्रयास करते हैं, इसलिए, तर्क की संभावना तो बचती ही नहीं. वे केवल अपना ही शोर अपनी ही मान्यताएं सुनते हैं. जिनका बौद्धिकता से कोई lena देना नहीं. सामाजिक परिवर्तन किसी भी मान्यता से बड़े होते हैं, हमारे सारे संकल्प, मान्यताएं और विश्वास धरे के धरे रह जाते हैं जब जीवन हमें यथार्थ और कटु यथार्थ के रूप में नए अनुभव नवाज़ता है. प्रगति और भौतिक विकास के युग में यह कोई विचित्र बात भी नहीं है. इसलिए किसी भी स्थिति पर तर्कसंगत ढंग से विचार करना चाहिए. इस विचार की आवश्यकता तब और बढ़ जाती है जब समस्या केवल एक व्यक्ति की नहीं बल्कि एक बड़े समुदाय की हो. वृद्ध व्यवस्था की आह शीर्षक लेख में मैंने पितृसत्तात्मक व्यवस्था की विकास प्रक्रिया को प्रस्तुत kiya है, इस प्रक्रिया में समलेंगिकता का भी ज़िक्र किया है, उसे जायज़ या नाजायज़ क़रार देना mera maqsad नहीं tha . पर हाँ, मैं यह zaroor मानती हूँ कि अपनी जीवन शैली का chunaav करना किसी का व्यक्तिगत निर्णय hona चाहिए, बशर्ते उस से समाज को वाकई कोई नुक्सान न हो. yadi कोई होमोसेक्सुअल है तो उसकी मर्ज़ी, हम और आप को उसे प्रताड़ित करने या sanskriti के ठेकेदार बनकर प्राणदंड का निर्णय सुनाने का कोई अधिकार नहीं है, इसे सुभाष जी जैसे लोग समझ नहीं सकते. हर समस्या का समाधान हिंसा नहीं होती, yahi तो वृद्ध व्यवस्था की आह है...

के द्वारा: vibha vibha

विभा जी ...आप जिसे एक culture का नाम दे रही है वह वास्तव में व्यभिचारियो के नए नए व्यभिचार करने के तरीको में एक है ... और हम उन्हें समर्थन दे कर न सिर्फ मजबूत कर रहे है balki अपनी नस्लों को खोखला बनाने का काम भी कर रहे है... कोई भी युग रहा हो मानसिक रूप से बीमार लोग हमेशा रहे है ... पर ये समाज में एक बीमारी के तौर पर ही रहे है ...ये मानक नहीं रहे है.... और बीमारी का इलाज उसे धक् कर उसका इलाज करना है न की खोल कर फैलाना .. आधुनिकता और उदारवाद के नाम पर ऐसे बेहुदे लोगो को बढ़ावा देना समाज के लिए खतरनाक है...आप इसके दुसरे पहलु पर क्यों नहीं सोचती... ये जरुरत किस वर्ग मे है वह वर्ग जो आर्थिक रूप से सक्षम है , जिसके पास सभी भौतिक सुख के साधन है ... वह अपनी ईयाशियो के लिए नए नए तरीके तलाश करता है...और हम उसे अधिकार के नाम पर शोषण करने की आजादी दे रहे है व्यक्तिगत स्वतंत्रता को इतना अधिक व्याख्यायित कर रहे है की वह हमारे लिए ही खतरनाक होती जा रही है... प्राकृतिक नियमो की अनदेखी कर रहे है...

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

विभा जी मैंने आपको पढ़ा और पाया कि सारी कसमसाहट आप जैसों को ही है जो शांत जल में बेवजह पत्थर फेक रहे हैं. क्या मिलता है आप जैसों को अराजकता की वकालत करके? समलैंगिकता की जिस तरह वकालत आप कर रही हैं वह सिद्ध करता है कि आप जैसों ने ही इस कुत्सित वृत्ति को बढ़ावा दिया है. क्या आप अपने किसी परिचित को समलैंगिक के रूप में देखना पसंद करेंगी. ईश्वर ने हर कार्य के लिए निश्चित अंग निर्धारित किया है. सेक्स के लिए क्या कोइ इतना भी पागल हो जाता है कि वह इस गंदगी को गले लगाने को तैयार हो जाता है. भोग की पाशविक प्रवृत्ति के हिमायतियों को यह समझ लेना चाहिए कि समाज में अभी सदाचारी बहुत हैं और यह मुद्दा विमर्श का नहीं बल्कि घृणा का है जिसके समर्थक सिर्फ व सिर्फ निंदा के पात्र हैं. अपनी काम पिपाशा को शांत करने के लिए ऐसे लोगों ने ना जाने कितनी गन्दगी फैला रखी है और फिर भी बेशर्म होकर अधिकार की मांग कर रहे हैं. यथा शीघ्र बलपूर्वक इस घातक कुत्सित वृत्ति पर लगाम नहीं लगाई गयी तो ऐसे हिजड़े समाज को एक नए तनाव में फंसा देने में सक्षम हो जाएँगे. समलैंगिकता पर विमर्श की बजाए प्रहार होना चाहिए.

के द्वारा:

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